Tuesday, 6 November 2012

……हर काली रात के बाद होता एक सवेरा सुनहेरा देखा है






रुकी हुई हैं  कुछ बाते, लबो तक आते आते 
की बातों का असर दिलो पे होते कुछ गहरा देखा है ,

कैद हैं कुछ ख्वाब जागती रात की इस वीराने में 
की सपनो पर हमने अश्को का पहरा देखा है 

बहुत हलचल है इसकी गहराई में 
ऊपर से जिस  पानी को तुमने शांत ठहरा देखा है , 

नाज था कभी जिन्हें अपनी उड़ानों पर 
आज भटकते उन्हें हमने सहरा-सहरा देखा है,

वार दिए अपने सपने और खुशियाँ जिनकी परवरिश में 
आज उन्ही संतानों को अपने माँ-बाप के बोझ से होते दोहरा देखा है,

नकारे किसको और किस पर यकीन करे 
की हर रोज़ हमने नियति का एक नया चेहरा देखा है,

छंट जाएगी हर धुंध बस थोडा धीरज रख दोस्त 
की हर काली रात के बाद  होता एक सवेरा सुनहेरा  देखा है 

-सोमाली 

  


  



8 comments:

  1. बहुत बढ़िया ।।

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  2. बेहतरीन रचना बहुत-2 बधाई.

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  3. शब्दों की जीवंत भावनाएं... सुन्दर चित्रांकन.
    बहुत सुंदर भावनायें और शब्द भी.बेह्तरीन अभिव्यक्ति!शुभकामनायें.
    आपका ब्लॉग देखा मैने और कुछ अपने विचारो से हमें भी अवगत करवाते रहिये.

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  4. http://bulletinofblog.blogspot.in/2012/12/2012-6.html

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  5. सुंदर प्रस्तुति:)

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  6. रुकी हुई हैं कुछ बाते, लबो तक आते आते
    की बातों का असर दिलो पे होते कुछ गहरा देखा है ,


    Bahut Badhiya...

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  7. बेहद प्रभाव साली रचना और आपकी रचना देख कर मन आनंदित हो उठा बहुत खूब

    आप मेरे भी ब्लॉग का अनुसरण करे

    आज की मेरी नई रचना आपके विचारो के इंतजार में

    तुम मुझ पर ऐतबार करो ।

    .

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  8. अच्छी पंक्तियां ....सच में समझ नहीं आता किस पर यकीन करें.....पर नया सवेरा आता है..पर कई बार रात इतनी गहरी हो जाती है कि इंतजार करते-करते आंखे बंद हो जाती है सोमाली जी।

    काव्य के शीर्षक में सुनहरा शब्द ठीक कर लें...

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